Sunday, July 10, 2016

कश्मीर

कभी जो स्वर्ग-सा संसार था, खुशियों से गुलजार था,
था जो स्वपनलोक जैसा, धरती पर खुश्बू का अम्बार था,
जल रहा नाराकान्क्षा की आग में दहक-दहक कर,
धरती का कोना वो, जो बर्फ का गुबार था.

सबने कहा, "ये मेरा है", सबने इसको बर्बाद किया,
सबका अहम् है जुड़ा इससे, वरना किसने इसको कब याद किया?
परिजन, निजजन सब रौंदते रहे दिन-ब-दिन,
कहाँ किसी ने सुना कि इसने हाय कब आह किया?

शोणित सिंधु-धार बना, लगी लहकने वादी अक्सर,
हर कोई घात लगा बैठा था, छोड़ा कहाँ किसी ने अवसर?
हित सधता देख अपना, नरपति बैठे सब आँखें मूँद,
छलनी छाती हुआ वादी का, बहता रहा सीने से लहू बूँद-बूँद.

हर कोई अमन के ख्वाब यहाँ दिखलाता है,
बरसों हुए सुनते अब, पर चैन कहाँ कोई पाता है?
कुछ कहते यहाँ लोगों कि किस्मत है खोटी, अमन है उसमे कहाँ.
मैं हूँ पूछता, घर, कपडा और रोटी, किसे नहीं चाहिए वहाँ?

बुरा है हर वो, जो बन्दूक में बन्दूक की काट खोज रहा है.
भला कभी किसी ने आग से आग को बुझते देखा है?
बंद हो ये खेल खून का, अब कश्मीर की घाटी में,
लेने दो साँस वहाँ भी, ना हो अब बारूद छाती में.

बसते हैं लोग अमनपसंद भी, वहाँ कश्मीर की वादी में,
क्या कभी भला कोई खुश हुआ है, अपने ही घर की बर्बादी में?
ना जाने किसकी बुरी नज़र, या बददुआ का असर हुआ है,
पर तुम ही कहो, कभी खून बहाकर कोई मसला हल हुआ है?


p.s. : Written on February 23, 2012.

Sunday, June 26, 2016

बे : तब का और अब का

फोटोग्राफी एक कीड़ा होता है जिसका कोई उपाय नहीं है। और इंस्टाग्राम वो एप्प है, जिसके जरिए ये कीड़ा हजारों को रोज अपनी गिरफ्त में ले लेता है। तो, हुआ यूँ की इंस्टाग्राम वालों ने एक सभा का आयोजन किया था, अंग्रेजी में, फोटोवाक। इस बार हम भी गए थे और वहां कुछ दोस्त बना लिए। अब दोस्त बना लिए तो जनाब एक और कीड़ा जोर मारने लगा, कि इन लोगों को ट्विटर या फेसबुक पर खोजा जाए। एक जनाब तो झटके से ही मिल गए, और हमने एक-दूसरे को आपस में जोड़ भी लिया। दूसरे जनाब कुछ हफ्तों बाद मिले, हुज़ूर ने जोड़ने का जरिया जिसे अंग्रेजी में फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजना बोलते हैं, ब्लॉक कर रखा था, सो हमने फॉलो कर लिया। हालाँकि बाद में हम-दोनों ने एक-दूसरे को जोड़ भी लिया(जो की अलग कहानी या नोट बन सकने लायक सामग्री है )। अब जुड़ने के बाद जनाब ने चैट पर पिंग किया:

जनाब : पटना से हो गुरु
बताये नहीं
मैं : खी खी खी
हमको लगा मिलने पे समझ जाओगे आप
जनाब : कहाँ से हो बे

और फिर कुछ बातें, जो एक पटनिया दूसरे से करता है, जब भी अपने शहर, राज्य से बाहर मिलता है।

उस दिन से सोंच रहा हूँ, कि ये "बे" शब्द अचानक कितना आत्मीयता लेकर आ गया? शायद इसमें अपने शहर से दूर होने का भी हाथ रहा हो, क्यूँकि एक समय था, जब बे सुनते ही झगड़ा-झंझट शुरू हो जाता था। ऐसा लगता था, जैसे किसी ने स्वाभिमान पे चोट की हो। स्कूल और कॉलेज के समय में कितनी बहसबाजियाँ हुई हैं इस बे शब्द के चक्कर में। आज वही कितना बदल गया है।

शायद समय और जगह के साथ हम भी बदल गए हैं और साथ-ही कुछ शब्दों ने अपने मायने भी बदल लिए हैं।

मने की आज हम भी नोस्टालजिक फील कर रहे हैं।

Friday, June 17, 2016

sun, sleep and sunbird

I've been working in night shifts from last I don't remember how many years. My daily routine is very much predictable, when everyone else settles at their workstations, I leave my workplace, go home, cook something, eat and sleep. And when everyone starts towards their home, I wake up, bath, again eat something and go to the workplace. While most of the friends are sleeping, I'm busy on my laptop, troubleshooting, working on client's servers, drafting emails or coding or just reading blogs and articles.

That first para is just to give an idea about my daily routine before this new change. From last few weeks, I've started following this couple of sunbirds that keep roaming around the trees near my office. There is one more couple of a small bird that looks similar to weaver bird (but with longer tails). I am bad with this science of birds, so will update the blog after figuring out the name of this other bird. This habit of spotting the birds started with my almost daily routine of morning tea in the office balcony. I saw the purple sunbirds first and then the other bird. What's common between them? Both birds are small and their voice is sweet. With time, it became a habit to spot them and now I just wait for them in the balcony, enjoying the morning breeze.(I was never a tea person and share tea with only few selected people/group).


The inclusion of sunbirds between the sunrise and my sleep is a rare happy change in my daily routine these days. Including a picture of this sunbird I clicked in the Keoladeo national park, Bharatpur.

Friday, January 8, 2016

अनाथ होने का दर्द

उसे रोता-बिलखता देख,
सब समझाने को आगे आये,
कोई ये नहीं समझ पाया कि
नींद खुलते ही अनाथ होना क्या होता है।
कोई ये नहीं जान पायेगा,
कि बचपन में उसे "लड़के कभी रोया नहीं करते",
कहने और समझाने वाला आज चला गया है।
कोई ये नहीं समझ पायेगा,
कि वो बाप उसका एकलौता दोस्त था,
भाई-बंधुओं से बढ़कर।

Sunday, December 6, 2015

Out of ideas and will

It's almost 15 months since my last post. The longest gap since I started blogging. Strangely, I have too many things to share here, just the ice needs to be broken. How? I don't know.

Sigh!

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